Tuesday, September 22, 2020

Arya High School Chakwal , Punjab, Pakistan

 












School Located at Chakwal, Punjab, Pakistan. Now this school serves as Computer Science Department of Government Post Graduate College Chakwal.


The writings written on commemorative stones read one by one as below:

1- ' Built By Lala Ram Chand D. F. O. Doctor Sita Ramin memory of their Beloved father late Lala Ishar Dass Sethi Chakwal 1933.'

2- ' Built in memory of S. Thakar Dass Jauhar of Vahalee by his son Lieut. Kirpa RamM. A. L. L. B. Rai Sahib.'

3- ' Built in memory of Munshi Bhawan Dass (Died 5-3-1930) by his wife Shrimati Bhagwanti and sons Messrs Chuni Lal Narain Dutt Chander Bhan and Satya Dev. '

4-' This Room was built by Shrimati Jawala Devi Dharam Patni Lala Sukhdyal Sahib of Wihali. '

5- 'This room was built in memory of Munshi Boota Mal Sahib and his Dharam Patni Shrimati Ameer Devi By Their Sons Lala Kashi Ram, Ashar Das  Siri Ram and Roshan Lal.'

6-  ' Office Room
Built in memory of Uggar Sain Sabharwal (Old Student of this school) died in the Quetta Earthquake 31st May 1935 by his father Kishan Chand Sabharwalof Chakwal. '

7- ' This Room was built by Shrimati Jawala Devi wife of Lala Sukhdyal Sahib of Wihali. '

8- ' OM
Built in memory of their Grandfather Bakhshi Kesar Mal Jaggi by his grandsons Bir Cjand And Gyan Parkash Sons of Bakhshi Piabh Dyal Jaggi Timber Merchants Chakwal April 1933.'

9- ' Built in memory of B. Yag Datta (Died 20-1-1931) by his father Sardar Anokh Rai Sethi of Chawli.'

लाहौर की दो प्रमुख आर्यसमाजें : आर्यसमाज अनारकली एवं आर्यसमाज वच्छोवाली


 


लाहौर की दो प्रमुख आर्य समाजें : आर्यसमाज अनारकली एवं आर्यसमाज वच्छोवाली


-स्व० विश्वनाथ

पाकिस्तान बनने से पहले पंजाब की दो प्रमुख आर्यसमाजें थीं जहां से पंजाब ही नहीं, किसी सीमा तक देश भर के आर्यजगत् की गतिविधियों की कल्पना की जाती थी और उन्हें साकार किया जाता था। आर्यसमाज अनारकली आर्य प्रादेशिक सभा की प्रमुख समाज थी उसके प्रेरणा स्त्रोत महात्मा हंसराज जी थे। दूसरी थी- आर्यसमाज वच्छोवाली जिसकी धुरी थे महाशय कृष्ण जी जो दैनिक प्रताप और साप्ताहिक प्रकाश के सम्पादक और संचालक थे।

आर्यसमाज अनारकली-
पहले आर्यसमाज अनारकली की बात करूंगा। क्योंकि मेरा घर और कार्यालय, 'आर्य-पुस्तकालय' दोनों अनारकली बाजार के साथ लगती हुई हस्पताल रोड पर स्थित थे इसलिए विशेष आयोजन हो तो अनारकली समाज में जाता ही था। नाम तो अनारकली था परन्तु समाज अनारकली बाजार में नहीं थी। वह निकट की ही एक सड़क गणपत रोड पर बहुत बड़े भवन में स्थित थी। आर्यसमाज का अपना विशाल भवन था। इसकी ऊपरी मंजिल पर दैनिक उर्दू मिलाप का कार्य चलता था जिसके सर्वेसर्वा महाशय खुशहाल चंद खुर्सन्द जी थे जो उन दिनों भी अपना पूरा समय आर्यसमाज को देते थे और बाद में संन्यास लेकर जिन्होंने महात्मा आनन्द स्वामी के नाम से आर्यसमाज की अविस्मरणीय सेवा की। गणपत रोड पर ही एक मकान की पहली मंजिल पर उर्दू साप्ताहिक 'आर्य गजट' का कार्यालय था जिसके सम्पादक महात्मा हंसराज जी थे। कालान्तर में लाला खुशहाल चंद जी सम्पादक बने। उन दिनों उर्दू का बोलबाला था, उर्दू ही राजभाषा थी, इसलिए आर्यसमाज के समाचार पत्र भी उर्दू में ही छपा करते थे।

आर्यसमाज अनारकली में प्रवेश करने के लिए एक बड़े गलियारे में से गुजरना पड़ता था। इसे पार करके एक बड़ा आंगन और इसके बाद आर्यसमाज का विशाल भवन। अतिथियों के ठहरने के लिए कुछ कमरों की व्यवस्था थी। वहीं मैंने पहली बार वीतराग स्वामी सर्वदानन्द जी के दर्शन किये थे। रविवार के साप्ताहिक सत्संग में डी०ए०वी० आन्दोलन से जुड़े सभी प्रमुख व्यक्ति नियम से आते थे जिनमें जस्टिस मेहरचंद महाजन प्रिंसीपल श्री जी० एल० दत्ता, प्रिंसीपल मेहर जी, बक्षी रामरतन जी, लाला सूरजभान जी, प्रो० दीवानचंद शर्मा, प्रो० चारूदेव जी, प्रो० ए० एन० बाली आदि अनेकानेक महापुरुष नियम से आते थे। महात्मा जी अपनी उपस्थिति से सदा यह सन्देश देते थे- सत्संग में आना बड़ा महत्वपूर्ण है। उनके अपने उच्च उदाहरण से भी सभी प्रभावित होते थे। उन दिनों उपस्थिति बहुत अधिक होती थी और पूरा हॉल भर जाता था। कार्यक्रम की शुरुआत तो वैसी ही होती थी जो आज है। पहले यज्ञ, फिर प्रार्थना, वेद प्रवचन, सामयिक विषयों पर भाषण और बाद में मन्त्री द्वारा आर्यसमाज की गतिविधियों की सूचना और समाचार। मेरी स्मृति के अनुसार इस विशाल भवन में बिजली के पंखे लगे हुए थे। बड़ी बात यह है कि सभी आर्यपुरुष अपनी आन्तरिक प्रेरणा से नियमपूर्वक साप्ताहिक सत्संग में बड़े उत्साह से भाग लेते थे।

पाकिस्तान बन जाने के तीन चार वर्ष बाद मुझे पाकिस्तान जाने का अवसर मिला। वहां आर्यसमाज मन्दिर अनारकली की जो दुर्दशा देखी, हृदय रो उठा। मन्दिर के भव्य भवन को मुसलमान शरणार्थियों का अड्डा बना दिया गया था। मन्दिर के चारों ओर गन्दगी फैली थी। मन्दिर के सबसे ऊपर जो गुम्बद था, जिस पर ओ३म् ध्वज फहरा करता, वह टूटा हुआ था। सीलन और दुर्गन्ध में ही वहां लोग रह रहे थे। जैसे भारतवर्ष में महात्मा गांधी और नेहरू जी ने मस्जिदों की रक्षा के लिए पूरी शक्ति लगा दी थी कि पंजाब से आने वाले शरणार्थी वहां घुस न पायें, वैसे पाकिस्तान ने क्यों नहीं किया। वहां तो डी०ए०वी० कॉलेज लाहौर का नाम भी बदलकर इस्लामिया कॉलेज रख दिया गया और प्रवेश द्वार में घुसते ही कॉलेज के बड़े लान में सफेद संगमरमर की नई मस्जिद बना दी गई। इन सब बातों पर अलग से लिखूंगा। आर्यसमाज के साप्ताहिक सत्संग में कभी-कभी प्रिंसीपल दीवानचंद जी (कानपुर वाले), सर गोकुल चंद नारंग आदि महापुरुष आया करते थे और भाषण देते थे। बक्षी सर टेकचंद जी शायद इसलिए नहीं आते थे क्योंकि वे पंजाब हाईकोर्ट के जज थे। कैसे थे वे दिन, कैसा था वह उत्साह, कैसी थी आर्यसमाज के प्रति दीवानगी उन दिनों।
यहां पर एक बात का और जिक्र करना चाहूंगा कि पंजाब के आर्य युवकों को एक झण्डे के तले लाने के लिए आर्य युवक समाज की स्थापना लाहौर में हुई थी जिसमें हम चार युवक सक्रिय थे- श्री देवराज चड्डा, श्री यश जी (सुपुत्र महात्मा आनन्द स्वामी), श्री ओंकार नाथ जी (मुम्बई वाले) और मैं। मुझे याद है कि आर्यसमाज अनारकली की वार्षिकोत्सव के दिनों हम अपना विशेष अधिवेशन करते थे जिसमें पंजाब के सभी जिलों से आर्य युवक प्रतिनिधि बड़े उत्साह से भाग लेने आते थे।

आर्यसमाज वच्छोवाली-
अब आर्यसमाज वच्छोवाली की कुछ स्मृतियां। इस समाज की स्थापना महर्षि दयानन्द जी के जीवनकाल में ही लाहौर में हो गई थी। लाहौर के चारों ओर एक बड़ी भारी मजबूत फसील (दीवार) थी जिसमें १२ दरवाजे थे जैसे मोरी दरवाजा, भाटी दरवाजा, मोची दरवाजा इत्यादि। इनमें शाह आलमी दरवाजा भी था जिसके अन्दर अनेकों बाजारों, गली-कूचों में हिन्दुओं के परिवार रहते थे और हिन्दुओं की दुकानें भी थीं। इसके अन्दर एक गली का नाम वच्छोवाली था। महाराजा रणजीत सिंह के समय की एक विशाल हवेली में यह आर्यसमाज स्थित था जो उस समय की स्थापत्य-कला का नमूना था। बेसमेंट का रिवाज तो अब चला है परन्तु आर्यसमाज वच्छोवाली में एक बेसमेंट भी था और गुरुद्वारों की भांति अनेक सीढ़ियां ऊपर की ओर चढ़कर प्रवेश द्वार था जिसके अन्दर एक मुख्य हॉल और तीन दिशाओं में तीन छोटे हॉल थे जिनमें एक महिलाओं के लिए सुरक्षित था। उन दिनों आर्यसमाज के गणमान्य सभासद हाथों में बहुत बड़े कपड़े के झालरदार पंखे लेकर उन्हें झुलाया करते थे जिससे श्रोतागण को गर्मी का अहसास कम हो और वे सत्संग में शान्तिपूर्वक भाग ले सकें। एक ही सयम में आठ-दस व्यक्ति साप्ताहिक सत्संग में अलग-अलग स्थानों पर इन पंखों को झुलाते थे। साप्ताहिक सत्संग में नगर के गणमान्य व्यक्ति जिनमें महाशय कृष्ण जी, पं० ठाकुर दत्त जी अमृतधारा, पण्डित ठाकुर दत्त वैद्य मुलतानी, पण्डित हीरानन्द जी, पायनियर स्पोर्ट्स के रोशनलाल जी, लाहौर के पोस्ट मास्टर भाटिया जी, रेलवे के बड़े उच्च अधिकारी सरदार मेहर सिंह जी और ऐसे ही कितने अनेक व्यक्ति नियम से आते थे।

लाहौर में आर्यसमाज का केन्द्रीय कार्यालय, गुरुदत्त भवन रावी रोड पर स्थित था जहां आर्य प्रतिनिधि सभा का विशाल कार्यालय भी था। वहां से स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी, स्वामी वेदानन्द जी, पं० प्रियरत्न जी, पण्डित बुद्धदेव जी विद्यालंकार, पण्डित ज्ञानचंद जी आर्यसेवक, पण्डित विश्वम्भरनाथ जी, आदि नियम से आते थे यदि वे लाहौर से बाहर नहीं गये हों। पूरा भवन खचाखच भरा रहता था। उन दिनों श्री देवेन्द्रनाथ अवस्थी एडवोकेट समाज में मन्त्री थे और मैं सहमन्त्री था।

वार्षिकोत्सव की धूम-
इन दोनों आर्यसमाजों का वार्षिकोत्सव नवम्बर के अन्तिम सप्ताह में एक साथ ही होता था। वच्छोवाली का वार्षिकोत्सव गुरुदत्त भवन के विशाल प्रांगण में होता था और अनारकली का डी०ए०वी० मिडल स्कूल लाहौर की ग्राउण्ड में और बाद में डी०ए०वी० हाई स्कूल के ग्राउण्ड में होने लगा। पंजाब भर के आर्यसमाजी नवम्बर में आने का कार्यक्रम समय से पहले ही बना लेते थे जहां उन्हें एक से बढ़कर एक विद्वान्, संन्यासी और प्राध्यापकों के विचार सुनने को मिलते थे और साथ ही विख्यात भजन मण्डलियों के भजन जिनमें चिमटा भजन मण्डली भी होती थी। कविवर कुंवर सुखलाल जैसे अद्वितीय कवि भी हुआ करते थे जो श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर देते थे। लोग रात के ११ बजे तक यह कार्यक्रम सुनते थे। पिछली पंक्तियों में खड़े लोग सुनते नहीं थकते थे। गुरुदत्त भवन और डी०ए०वी० को जोड़ने वाली सड़क पर भीड़ का तांता लगा रहता था सैकड़ों आर्यपुरुष, देवियां और बच्चे उत्साह से इधर से उधर जाते रहते थे- एक उत्सव से दूसरे उत्सव की ओर। वह एक दर्शनीय दृश्य होता था। अब तो बस इसकी यादें रह गई हैं। सम्भवतः आज की पीढ़ी को इन सब पर विश्वास करना कठिन हो परन्तु यह आर्यसमाज के स्वर्ण युग की झांकी है जो अब स्मृति शेष रह गई है।

वार्षिक उत्सव के प्रारम्भ में शुक्रवार के दिन विशाल नगर कीर्तन निकाला जाता था जो सारे नगर की परिक्रमा करता था और जिसकी शान और सजधज देखते बनती थी। प्रत्येक जिले से आर्यसज्जन अपनी-अपनी मण्डली बनाकर ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज का गुणगान करते हुए पैदल चलते थे। ऐसी मण्डलियां ५० से अधिक ही होती थीं। अलग-अलग जिलों से आने के कारण उनके पहनावे और बोली में भी काफी अन्तर होता था। जैसे फ्रंटियर के आर्यसमाजी और मुलतान से आने वाले सज्जन, दोनों का पहनावा और उच्चारण अपनी विशेषता लिए हुए होता था, मानो अनेकता में एकता का दर्शन हो। इस जुलूस में आर्यसमाज के प्रमुख विचारक और प्रचारक जगह-जगह प्रत्येक चौक में गाड़ी खड़ी करके वेद प्रचार करते थे। इसी प्रकार अनेक बैलगाड़ियों पर प्रसिद्ध गायक और भजन मण्डली पूरी साज-सज्जा के साथ भजन गाते थे। डी०ए०वी० कॉलेज और डी०ए०वी० स्कूलों के विद्यार्थी और अध्यापक केसरी रंग की पगड़ियां पहने हुए पंक्तिबद्ध होकर चलते थे और "हम दयानन्द के सैनिक हैं, दुनिया में धूम मचा देंगे" का गान करते थे तो एक समां बंध जाता था। आप सम्भवतः आश्चर्य करें कि डी०ए०वी० कॉलेज के सभी विद्यार्थियों की हाजिरी ली जाती थी ताकि प्रत्येक विद्यार्थी का नगर-कीर्तन में सम्मिलित होना सुनिश्चित हो। मुस्लिम बहुल लाहौर शहर में इस नगर कीर्तन के कारण मुसलमानों के हृदय पर परोक्ष रूप से आतंक भी छा जाता था। महात्मा हंसराज जी प्रायः अनारकली में प्रसिद्ध दुकान 'भल्ले दी हट्टी' के मुख्यद्वार पर बैठकर इस शोभायात्रा का आनन्द लेते थे। गलियों, बाजारों के दोनों ओर दुकानों और छतों से भी नर-नारी बच्चे उस नगर कीर्तन को देखते थे। इस भव्य यात्रा में शारीरिक व्यायाम के करतब, गतकों के खेल आदि भी देखने को मिलते थे। वार्षिकोत्सव शनिवार और रविवार को होता था, परन्तु लाहौर के गली-मोहल्लों में आर्यपुरुषों और देवियों की प्रभात फेरिया एक सप्ताह पहले से ही सबको सूचना देने के लिए शुरू हो जाती थी। डी०ए०वी० के अध्यापक पन्द्रह दिन पहले ही सारे नगर में वार्षिकोत्सव की सूचना देने वाले कपड़े के बोर्ड सड़कों के आर-पार लगा देते थे। आज न वे दिन रहे, न उत्साह, न धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा।
-स्व० विश्वनाथ जी के आलेखों से

[स्त्रोत- टंकारा समाचार : श्री महर्षि दयानन्द सरस्वती स्मारक ट्रस्ट का मासिक पत्र का अगस्त २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Aryasamaj Mandir Tehsil Pattoki Kasur District Pakistan

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Aryasamaj Industrial Training Institute in Sialkot

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Monday, April 27, 2020

पुरातत्त्व संग्रहालय की स्थापना (स्वामी ओमानंद सरस्वती जी का पुरुषार्थ)






पुरातत्त्व संग्रहालय की स्थापना (स्वामी ओमानंद सरस्वती जी का पुरुषार्थ)

श्री आचार्य जी महाराज के स्वभाव में दो गुण बहुत प्रमुख हैं । प्रथम वे ऐसे कार्य को अवश्य करते हैं जो श्रेष्ठ हो, किन्तु कठिन होने के कारण जिसको करने का साहस कोई अन्य नहीं कर पाये । दूसरा, वे जिस भी कार्य को करते हैं उसमें अपनी पूरी शक्ति लग देते हैं । उसमें समय और साधन का अभाव कभी बाधक नहीं बन सकता । एक समय में अनेक कार्य ये करते हैं परन्तु प्रमुखता एक ही कार्य की होती है और उसको तब तक करते रहते हैं जब तक वह अपनी पूर्णता को न छू ले । गुरुकुल में समय समय पर पनपी और फूली-फली विविध प्रवृत्तियों का यही एक रहस्य है । वे सब आचार्य जी महाराज के इस स्वभाव की वास्तविक प्रतिविम्ब हैं । गुरुकुल झज्जर में पुरातत्त्व संग्रहालय की स्थापना के पीछे भी कदाचित् यही रहस्य है

पुरातत्त्व संग्रहालय का विधिवत् उद्घाटन गुरुकुल के ४६वें वार्षिकोत्सव पर १३ फरवरी १९६१ ई० के दिन राजस्थान के प्रसिद्ध नेता चौ० कुम्भराम आर्य के करकमलों द्वारा हुआ । इस संग्रहालय का पूरा नाम "हरयाणा प्रान्तीय पुरातत्त्व संग्रहालय" रखा गया । उद्घाटन के समय पुरातत्त्वीय सामग्री केवल एक छोटे से प्रकोष्ठ (कमरे) में फैलाकर रखी गई थी । उस समय कुछ सिक्के, ठप्पे और प्राचीन इंटें ही संग्रहालय में थीं । सिक्के कांसे की थालियों में सजाकर रखे गये थे । सम्भवतः स्वयं आचार्य जी महाराज को भी नहीं पता था कि बहुत शीघ्र ही यह संग्रहालय विशाल रूप धारण कर लेगा किन्तु सभी समझदार व्यक्ति उस समय कह रहे थे कि शीघ्र ही समय आयेगा जब ये थोड़े से दीखने वाले सिक्के एक आधुनिक ढ़ंग के विशाल संग्रहालय का रूप धारण कर लेंगे । कारण कि यह कार्य परम तपस्वी कर्मठ नेता श्री आचार्य जी द्वारा आरम्भ जो हुआ है । हुआ भी यही । २३ फरवरी १९६३ ई० को संग्रहालय के फैलाव को विस्तृत रूप दिया गया । अब नये भवनों के सात प्रकोष्ठों में भी सामग्री नहीं समा रही थी । संग्रहालय में हजारों प्राचीन सिक्के, मुद्रा-सांचे, मोहरें, मूर्तियां, शिलालेख और पांडुलिपियां आदि आचार्य जी ने एकत्र कर लीं थीं । दुर्लभ सामग्री दिन प्रतिदिन बढ़ रही थी । प्रारम्भिक दिनों में ब्र० धर्मपाल (महाराष्ट्र) संग्रहालय का काम संभालता था । सन् १९६२ से मैंने (योगानन्द) तथा कुछ दिन उपरान्त ब्र० विरजानन्द जी ने मिलकर संग्रहालय का कार्य संभालना प्रारम्भ किया । श्री आचार्य जी महाराज इस कार्य में इतनी अधिक लग्न से जुट गये कि हर एक सप्ताह/ दस दिन के बाद इतनी अधिक सामग्री लाने लग गये कि उसको संभालना कठिन हो गया । देखते ही देखते दुर्लभ स्वर्ण मुद्रायें भी लाने लगे । उनसे भी अधिक मूल्यवान् और महत्त्वपूर्ण अन्य सामग्री भी इन्होंने एकत्रित की । उन सबका वर्गीकरण और संरक्षण भी बड़ा कठिन कार्य था । थोड़े दिन बाद ही संग्रहालय की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी । भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग और संग्रहालयों के अधिकारी यहां आने लगे । यहां के संग्रहालय को वे विस्फारित नेत्रों से देखते और कहते - हम तो कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि केवल एक व्यक्ति भी इतना बड़ा और महत्वपूर्ण संग्रहालय बना सकता है और वह भी बिना किसी सरकारी या गैर-सरकारी सहायता के ही । वास्तव में यह बड़ा अद्भुत और अनूठा प्रयोग आचार्य जी का है । जिस बहुमूल्य सामग्री को प्राप्त करने के लिये शासन-तंत्र पानी की तरह पैसा बहाता है उसे श्री आचार्य जी बहुधा या तो भेंट में प्राप्त कर लेते हैं या नाममात्र के मूल्य पर । यह सब इनके महान् व्यक्तित्व और सेवा का ही फल है ।

अल्पकाल में इतने बड़े संग्रहालय (म्यूजियम) का निर्माण केवलमात्र श्री पूज्य आचार्य जी के अटूट उत्साह, गम्भीर अध्यवसाय, प्रबल लग्न, दृढ़ संकल्प और विशिष्ठ कार्यक्षमता का ही परिणाम है । अनेक संस्थाओं का कार्यभार तथा अहर्निश जनजागृति एवं जनकल्याण की चिन्ता और इस पर भी अत्यल्प सीमित साधन होते हुये इतने बड़े राष्ट्रीय स्तर के संग्रहालय का निर्माण उनके अपने विशिष्टगुणसम्पन्न कर्मठ व्यक्तित्व की ओर संकेत कर रहा है । जिन सज्जनों ने इस संग्रहालय को अपनी सूक्ष्मेक्षिका से एवं अध्ययनात्मक दृष्टि से देखा है वे जानते हैं यहां कितनी महत्त्वपूर्ण, दुर्लभ और उपादेय ऐतिहासिक सामग्री एकत्रित है । इसको एकत्रित करने के लिए कितना कष्टसाध्य परिश्रम और व्यय करना पड़ा है ? यह कल्पना से परे की बात है । संग्रहालय में काम करते हुये हमने आचार्य जी के साथ अनेक बार यात्रायें की हैं । उन लंबी यात्राओं की अपनी ही कहानी है । सन् १९६७ की बात है । ज्येष्ठ का तपता हुआ मास था । इलाहाबाद से लगभग ६४ किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण पश्चिम में यमुना के तट पर प्राचीन नगर कौशाम्बी के खण्डहरों पर हम घूम रहे थे । यहां एक विशेष उद्देश्य से हम आये थे । हमें सूचना मिली थी कि यहां किसी व्यक्ति को ताम्रपत्र मिले हैं । खोजते हुए हम उसके घर पहुँचे । पता चला कि वह ताम्रपत्रों को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच चुका है । हम उसके यहां पहुंचे । वह उसका महत्त्व व मूल्य बढ़ाने के लिये आसानी से दिखाना नहीं चाहता था । बहुत कठिनाई से उस व्यक्ति ने एक-एक करके वे चारों ताम्रपत्र और राजा की वह मोहर हमें दिखलाई जो उनमें लगी थी । अगले दिन ११ बजे तक हम उसको देने के लिये राजी कर पाये । वह उनके तीस हजार रुपये मांगता था । जबकि सौदा हुआ तीन हजार में । इन ताम्रपत्रों में कम से कम २५ किलो वजन तो है ही । ठीक ग्यारह बजे हम उनको सिर पर उठाकर चले । यहां से लगभग १५ किलोमीटर दूर सराय आकिल पहुंचकर हमें इलाहाबाद के लिये बस पकड़नी थी । इस बार हमारे पास जीप नहीं थी । गांववालों ने कहा कि दोपहर का समय है, तांगा नहीं मिलेगा, आप मत जाइये । परन्तु आचार्य जी ने एक बार जो ठान लिया उसको कैसे मोड़ा जा सकता था । श्री पूज्य आचार्य जी सदा नंगे पैरों रहते हैं । मैं भी नंगे पैर था । उस दिन इतनी तेज धूप और गर्मी थी कि जीवन में शायद ही कभी मैंने देखी होगी ।

सच मानिये मैं उस समय नहीं चलना चाहता था । धूप से घबरा रहा था । इस बात को आचार्य जी भी जान गये । इसलिये अब तो चलना और भी आवश्यक हो गया । वे अपने ब्रह्मचारी को इतना निर्बल देखना कैसे पसन्द कर सकते थे । किन्तु ब्रह्मचारी के सामने "दुबली को दो आषाढ़" वाली कहावत याद आ रही थी । एक तो भयंकर तपती धरती पर नंगे पैर चलना और दूसरे सिर पर ताम्रपत्रों का भार । श्रद्धावश मैं आचार्य जी को वे दे नहीं सकता था किन्तु जब हम कई किलोमीटर चलकर आ चुके तो न जाने वह श्रद्धा कहां काफूर हो गई । मैं मन ही मन चाहने लगा कि किसी तरह आचार्य जी एक बार फिर ताम्रपत्र लेने के लिये कह दें तो मैं झट इस भार को दे दूं । थोड़ी देर में उन्होंने फिर कहा और मैंने थोड़ी राहत महसूस की । मुझे आठ वर्ष गुरुकुल में रहते हुये हो गये थे । दुनियावी दृष्टि से वहां तपस्या भी कर रहे थे किन्तु उस दिन मैंने जाना, वास्तविक तपस्या तो आज हुई है जिसको आचार्य जी रोज ही करते हैं । उस दिन मैंने इनको जितना निकट से देखा शायद पहले कभी नहीं । नंगे सिर, पैर, भूखे पेट, सूखे ओठ निर्जन वन में से १५ किलोमीटर यात्रा करके जिसके चेहरे पर कोई रेखा नहीं आई वह आदमी किस धातु का बना होगा, यह आप अनुमान लग सकते हैं । दूसरी ओर मैं था जो इस यात्रा को महादुःख मान रहा था किन्तु आचार्यप्रवर के लिये यह सामान्य बात थी । एक के मन में यात्राजन्य विषाद था तो दूसरे के मन में लक्ष्यप्राप्ति का उत्साह । कितना बड़ा अन्तर है दोनों के बीच । शायद यही अन्तर इनको महान् बनाता है । इस तरह की न जाने आचार्य-प्रवर ने कितनी यात्रायें की हैं, तब इस संग्रहालय का निर्माण हुआ है । इस कार्य पर वे छः जीप जीर्ण कर चुके हैं । इससे सहज में जाना जा सकता है उन्होंने इस कार्य के लिये कितना परिश्रम किया है ।

एक बार कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास, पुरातत्त्व व संस्कृति विभाग के रीडर डा० सूरजभान हमारे साथ हरयाणा की ऐतिहासिक यात्रा पर थे । वे भी गर्मी के ही दिन थे । उस समय अनेक पुरातत्त्वीय महत्त्व के प्राचीन खंडहरों का सर्वेक्षण हमने किया । यात्रा के उपरान्त उन्होंने कहा - आचार्य जी महाराज जितना कर्मठ और धुन का धनी आदमी मैंने आज तक न तो देखा है और शायद न ही अपने जीवन में देख ही पाऊंगा ।

सन् १९६३ में आचार्य जी ने कन्या गुरुकुल नरेला में भी पुरातत्त्व संग्रहालय की स्थापना की । यह संग्रहालय भी झज्जर गुरुकुल संग्रहालय की भांति अति समृद्ध और महत्त्वपूर्ण संग्रहालय है । यहां भी संग्रहालय को यहां की स्नातिकायें या ब्रह्मचारिणियां ही संभालती हैं । झज्जर संग्रहालय का सम्पूर्ण कार्यभार ब्र० विरजानन्द दैवकरणि पर है । वे पिछले अठारह वर्ष से इस कार्य में जुटे हैं । उनका गहन अध्ययन है । ब्राह्मी, खरोष्ठी और इण्डोग्रीक आदि प्राचीन लिपियों के वे विद्वान् हैं । अरबी फारसी का भी अध्ययन उन्होंने किया है । श्री आचार्य जी सामग्री लाकर उन्हें सौंप निश्चिन्त हो जाते हैं । वे जिस आत्मीयता से उनका रख-रखाव व अध्ययन करते हैं वह वास्तव में प्रशंसनीय है । पूज्य आचार्य जी को अपने कार्य व तपस्या के अनुरूप ही वे मिले हैं । इसी कारण आचार्य जी (स्वामी जी) प्रचार आदि के कार्य के लिये समय निकाल लेते हैं । कई वर्ष तक स्वयं मैंने भी संग्रहालय को संभाला है किन्तु श्री विरजानन्द मुझ से कहीं अधिक तन्मयता, लगन, श्रद्धा और परिश्रम से कार्य करते हैं । इस युग में ऐसे कर्मठ आचार्य और उसके अनुरूप शिष्य का मिलना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है ।

श्री आचार्य जी द्वारा स्थापित ये दोनों संग्रहालय आज देश के प्रमुख संग्रहालयों में से हैं । यहां बहुत सारी ऐसी पुरातत्त्वीय सामग्री है जो दूसरे किसी म्यूजियम में नहीं है । प्राचीन सिक्कों का संग्रह इन दोनों में ही बेजोड़ है । सिक्कों की दृष्टि से देशभर का कोई भी संग्रहालय इनकी बराबरी नहीं कर सकता । प्राचीन गणतंत्रों के सिक्के, प्राचीन मुद्रा सांचे, शुंग, कुषाण और गुप्तकालीन मृण्मूर्तियां और हजारों मोहरें यहां की अपनी विशेषता है । प्रस्तर-मूर्तियां व पांडुलिपियां ताम्रपत्र और शिलालेख भी यहां पर्याप्त मात्रा में हैं । ये संग्रहालय विशुद्ध पुरातत्त्वीय संग्रहालय हैं । ताम्रयुगीन शस्त्राशस्त्रों का भी यहां अनूठा संग्रह है ।

संग्रहालय के निर्माण में अनेक लोगों का योगदान रहा है । मास्टर भरतसिंह बामला, स्वामी नित्यानन्द, वानप्रस्थी रामपत, गंगाविष्णु शर्मा सिहोल आदि अनेक लोगों मे संग्रहालय को सामग्री दी है । संग्रहालय प्रारम्भ करने का भी एक रोचक इतिहास है । श्री अचार्य जी की इतिहास में प्रारम्भ से ही रुचि थी । ये यत्र-तत्र अपने भाषणों में भी इतिहास व पुरातत्त्व संबन्धी चर्चा करते रहते थे । इनके सभी श्रद्धालु इनकी इस रुचि से परिचित थे । एक दिन ये गढ़ी (बोहर) गांव में थे कि श्री महाशय सूबेसिंह आर्य ने एक काली मिट्टी का गोल सा ठप्पा लाकर दिया और कहा कि एक बूढ़ा आदमी इसको हुक्के की चिलम में ठीकरी का प्रयोग करता है । उस समय यह किसी को नहीं पता था कि यह किसी प्राचीन टकसाल का सांचा है । यह बहुत ही गोल व व्यवस्थित बना था । कुछ चिह्न भी उस पर अंकित थे । श्री आचार्य जी ने वह मिट्टी की वस्तु परीक्षण के लिए श्री पं० जयचन्द्र विद्यालंकार के पास भेज दी किन्तु वे भी इसको नहीं जान पाये । कई वर्ष तक श्री आचार्य जी भी उसको नहीं पढ़ पाये । वास्तव में उस पर आदि देवनागरी लिपि में 'राह' ये दो अक्षर अंकित थे । बाद में जब कुछ और उसी प्रकार के मुद्रा-सांचे मिले तो पता चला कि यह गुर्जर प्रतिहार राजा आदि बराह मिहिर भोज के मुद्रा-सांचे हैं जिनमे किसी पर 'आदि' और किसी पर 'राह' शब्द अंकित है । उसके बाद मैं तथा ब्र० दयानन्द वहां गये । तीन दिन हम उस खण्डहर पर खुदाई करते रहे । वहां हमें पूरी टकसाल मिली । वहां गुर्जर प्रतिहार सामन्तदेव और गधैय्या वंशों की तीन टकसालें थीं । इन टकसालों से लगभग छः हजार सांचे हमने निकाले । टकसाल के दूसरे उपकरण भी मिले । वहां लोगों से बात करने पर पता चला कि यहां ये सांचे-ठप्पे गोफियों में डालकर चिड़िया उड़ाने के लिये फेंके जाते रहे हैं और इस प्रकार यह अमूल्य निधि वर्षों से नष्ट हो रही थी । श्री आचार्य जी की प्रेरणा पर हमने जाकर इसे बचाया ।

दो प्राचीन खंडहरों पर श्री आचार्य जी ने उत्खनन (excavation) भी कराया । अगस्त १९६४ में औरंगाबाद के टीले पर तथा सन् १९६९ में मित्ताथल (भिवानी) में यह खुदाई हुई । गुरुकुल झज्जर के ब्रह्मचारियों ने इन दोनों उत्खननों में भाग लिया । इनसे भी संग्रहालय को सामग्री मिली । नौरंगाबाद से तो बहुत ही महत्त्वपूर्ण सामग्री समय-समय पर मिलती रही है । यहां आहत मुद्राओं, 'यौधेयानां बहुधान्यके' प्रकार की मुद्राओं, इण्डोग्रीक तथा कुषाण मुद्राओं की टकसालें मिली हैं । इन से प्राचीन भारत में मुद्रा-निर्माण पद्धति पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है । मुख्य रूप से इन्हीं के आधार पर श्री स्वामी ओमानन्द सरस्वती (आचार्य भगवानदेव) जी ने "भारत के प्राचीन लक्षण स्थान" नामक ग्रन्थ की रचना की है । संग्रहालय की दुर्लभ और महत्त्वपूर्ण सामग्री के आधार पर इनका दूसरा ग्रन्थ "भारत के प्राचीन मुद्रांक" (Seals and Sealings of Ancient India) भी प्रकाशित हो चुका है । ये दोनों ही ग्रन्थ भारतीय इतिहास और पुरातत्त्व की अमूल्य निधि हैं । मुद्रा-निर्माण पद्धति पर तो इतना विस्तृत ग्रन्थ पहली बार सामने आया है । दर्जनों प्राचीन नई टकसालों को प्रकाश में लाकर इन्होंने इतिहास जगत् को अमूल्य देन दी है जिसका मूल्यांकन भविष्य में अधिक हो सकेगा । इन ग्रन्थों के लिखने में श्री ब्र० विरजानन्द जी ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है । स्वामी जी महाराज अब अपना अगला ग्रन्थ "ताम्रयुगीन शस्त्राशस्त्र" लिखने में संलग्न हैं । श्री आचार्य जी ने संग्रहालय में जो सामग्री एकत्रित की है वह राष्ट्र की अमूल्य निधि है । इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुये समय-समय पर भारत सरकार और हरयाणा सरकार संग्रहालय को आर्थिक अनुदान देती रही है । यद्यपि कार्य और संग्रह के प्रदर्शन और रख-रखाव की दृष्टि से वह अनुदान नगण्य सा ही है तथापि शासन द्वारा उसकी स्वीकृति मात्र ही कार्य की महत्ता के लिये कम नहीं । वैसे यह हमारे देश की विडंबना ही है कि व्यर्थ के कामों में शासन का धन पानी की तरह बहता है और अच्छे कार्यों के लिये अपेक्षित सहायता और प्रोत्साहन नहीं मिलता । इसी कारण यहां राष्ट्रीय हित के कार्यों में रुचि लेने की प्रवृत्ति साधारण लोगों में दृष्टिगत नहीं होती । वास्तव में आचार्य जी द्वारा संग्रहालयों का निर्माण राष्ट्र को उनकी एक बहुत बड़ी देन है ।

संग्रहालय की स्थापना के साथ ही आचार्य जी महाराज ऐतिहासिक शोध की ओर अधिक प्रवृत्त हुये । इन्होंने कई ऐसी खोजें की हैं जो अभूतपूर्व तो हैं ही, साथ ही भारतीय इतिहास की बहुत बड़ी उपलब्धि भी हैं । इसी कारण इनको कई बार विदेशों से निमन्त्रण आये और इन्होंने वहां अपने शोध लेख प्रस्तुत किये । इसका उल्लेख हम इनकी विदेश यात्रा प्रसंग में करेंगे । एक यात्रा में मैं भी इनके साथ था । योरोपीय देशों में भी इनके व्यक्तित्व की छाप पड़े बिना नहीं रहती थी, यह मैंने देखा ।

पुस्तक :- स्वामी ओमानंद सरस्वती जीवन चरित्
लेखक :- श्री वेदव्रत शास्त्री (आचार्य प्रिंटिंग प्रेस रोहतक)

Saturday, April 18, 2020

विश्व की प्रथम गौशाला, रेवाड़ी ( राव राजा युधिष्ठिर सिंह जी यदुवँशी द्वारा निर्मित)



                                                            Rao RajaYudhisthir Singh Ji


Pic of World First Cow Shelter Home (Gaushala) established by Rao Yudhisthir in Rewadi on advice of Swami Dayanand Saraswati, the founder of Aryasamaj. Swami Dayanand later on Published GaukarunaNidhi Book (A treatise of mercy on Holy Cow)

                                                    (Gaushala front gate View)

॥ विश्व की प्रथम गौशाला, रेवाड़ी
( राव राजा युधिष्ठिर सिंह जी यदुवँशी द्वारा निर्मित) ॥
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दस्तावेज़ों के अनुसार आधुनिक युग की सर्वप्रथम गौशाला हरियाणा के रेवाड़ी जिले (अहीरवाल) में स्थित है।
इस गौशाला का निर्माण सन् 1874 में रेवाड़ी रियासत के क्षत्रिय यदुवंशी अहीर राजा राव युधिष्ठिर सिंह जी ने करवाया था।
आज 12 फरवरी विश्वगुरू, ब्राह्मण श्रेष्ठ स्वामी दयानंद सरस्वती जी के जन्मदिवस पर उन्हें शत् शत् नमन।
इस निर्माण के पीछे रोचक घटना पर एक नज़र।
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परमपूज्य स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के रेवाड़ी रियासत के यदुवंशी रजवाड़ों के साथ बहुत अच्छे संबंध थे।
1873 में स्वामी दयानन्द का रेवाड़ी आगमन ऐतिहासिक रहा।
उस वक्त रेवाड़ी के राजसिंहासन पर राजा राव युधिष्ठिर सिंह जी नशीन थे जो 1857 के महानायक, यदुकुल सिरमौर रेवाड़ी नरेश महाराजा राव तुला सिंह बहादुर के पुत्र थे।
राजा राव युधिष्ठिर सिंह के राज के दौरान स्वामी जी का रेवाड़ी आगमन हुआ।
स्वामी जी ने राव युधिष्ठिर सिंह को उनके महान पुर्वजों का स्मरण तथा उनके पुर्वज द्वारिकाधीश भगवान कृष्ण का स्मरण कराते हुए उन्हें आर्य समाज के कल्याण के लिए मदद करने को कहा।
स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के व्यक्तित्व से राजा राव युधिष्ठिर सिंह बहुत प्रभावित हुए और रेवाड़ी के महल में स्वामी जी का स्वागत करते हुए विनती करी कि वे रेवाड़ी रुककर यदुवंशी रजवाड़ों की शान में बनी शाही छतरियों में रुककर रेवाड़ी के लोगों को अपने अनमोल प्रवचन वाणी से लोगों को धन्य करें।
फिर उसी वर्ष 1874 में रेवाड़ी में राजा राव युधिष्ठिर सिंह के हुक्म के अनुसार दुनिया की सर्वप्रथम 'गौशाला' का शिलान्यास किया गया।
राव युधिष्ठिर सिंह जी ने स्वामी जी को रेवाड़ी के महल की छत से दिख रहे विशाल भूमंडल की और इशारा करते हुए कहा कि-
" हे स्वामी जी हमारे रियासत का विशाल भूमंडल जो महल के छत से दिख रहा है आप अपने ऊंगलियों से इशारा करते हुए बताईये की कितनी ज़मीन हम गौमाता के रहवास के लिए दान करें।"
स्वामी जी ने महल की छत से दूर दूर तक जहाँ तक उनकी नज़र विशाल भूमंडल पर पड़ी उन्होंने ने अपने हाथों से इशारा करते हुए माँगी।
इस प्रकार 1874 में दस्तावेजों के अनुसार रेवाड़ी में आधुनिक युग की प्रथम और विशालतम गौशाला का निर्माण कराया गया और राजा राव युधिष्ठिर सिंह ने स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से ही गौशाला का शिलान्यास करवाया और गौशाला का नामकरण स्वामी जी के नाम पर पड़ा "स्वामी दयानन्द सरस्वती गौशाला"।
गौशाला की इमारत बहुत ही भव्य और आलिशान है और आज भी यहाँ लाखों गउओं की देखरेख की जाती है।
[मेरे परदादा श्री रामकिशन जी आर्य ने स्वामी दयानन्द के 1878 में गौशाला की स्थापना के समय ही उनके भाषण सुनकर वैदिक धर्म स्वीकार किया था। -डॉ विवेक आर्य]

Wednesday, April 15, 2020

Swami Krishnanand Ji: Aryasamaj Reformer in Sindh



                                 Swami Krishnanand Ji: Aryasamaj Reformer in Sindh



Pic- Short Biography of Swami Krishnanand Ji by Tarachand Gajra from book Swami Dayanand on Bhakti