श्री आचार्य जी महाराज के स्वभाव में दो गुण बहुत प्रमुख हैं । प्रथम वे ऐसे कार्य को अवश्य करते हैं जो श्रेष्ठ हो, किन्तु कठिन होने के कारण जिसको करने का साहस कोई अन्य नहीं कर पाये । दूसरा, वे जिस भी कार्य को करते हैं उसमें अपनी पूरी शक्ति लग देते हैं । उसमें समय और साधन का अभाव कभी बाधक नहीं बन सकता । एक समय में अनेक कार्य ये करते हैं परन्तु प्रमुखता एक ही कार्य की होती है और उसको तब तक करते रहते हैं जब तक वह अपनी पूर्णता को न छू ले । गुरुकुल में समय समय पर पनपी और फूली-फली विविध प्रवृत्तियों का यही एक रहस्य है । वे सब आचार्य जी महाराज के इस स्वभाव की वास्तविक प्रतिविम्ब हैं । गुरुकुल झज्जर में पुरातत्त्व संग्रहालय की स्थापना के पीछे भी कदाचित् यही रहस्य है
पुरातत्त्व संग्रहालय का विधिवत् उद्घाटन गुरुकुल के ४६वें वार्षिकोत्सव पर १३ फरवरी १९६१ ई० के दिन राजस्थान के प्रसिद्ध नेता चौ० कुम्भराम आर्य के करकमलों द्वारा हुआ । इस संग्रहालय का पूरा नाम "हरयाणा प्रान्तीय पुरातत्त्व संग्रहालय" रखा गया । उद्घाटन के समय पुरातत्त्वीय सामग्री केवल एक छोटे से प्रकोष्ठ (कमरे) में फैलाकर रखी गई थी । उस समय कुछ सिक्के, ठप्पे और प्राचीन इंटें ही संग्रहालय में थीं । सिक्के कांसे की थालियों में सजाकर रखे गये थे । सम्भवतः स्वयं आचार्य जी महाराज को भी नहीं पता था कि बहुत शीघ्र ही यह संग्रहालय विशाल रूप धारण कर लेगा किन्तु सभी समझदार व्यक्ति उस समय कह रहे थे कि शीघ्र ही समय आयेगा जब ये थोड़े से दीखने वाले सिक्के एक आधुनिक ढ़ंग के विशाल संग्रहालय का रूप धारण कर लेंगे । कारण कि यह कार्य परम तपस्वी कर्मठ नेता श्री आचार्य जी द्वारा आरम्भ जो हुआ है । हुआ भी यही । २३ फरवरी १९६३ ई० को संग्रहालय के फैलाव को विस्तृत रूप दिया गया । अब नये भवनों के सात प्रकोष्ठों में भी सामग्री नहीं समा रही थी । संग्रहालय में हजारों प्राचीन सिक्के, मुद्रा-सांचे, मोहरें, मूर्तियां, शिलालेख और पांडुलिपियां आदि आचार्य जी ने एकत्र कर लीं थीं । दुर्लभ सामग्री दिन प्रतिदिन बढ़ रही थी । प्रारम्भिक दिनों में ब्र० धर्मपाल (महाराष्ट्र) संग्रहालय का काम संभालता था । सन् १९६२ से मैंने (योगानन्द) तथा कुछ दिन उपरान्त ब्र० विरजानन्द जी ने मिलकर संग्रहालय का कार्य संभालना प्रारम्भ किया । श्री आचार्य जी महाराज इस कार्य में इतनी अधिक लग्न से जुट गये कि हर एक सप्ताह/ दस दिन के बाद इतनी अधिक सामग्री लाने लग गये कि उसको संभालना कठिन हो गया । देखते ही देखते दुर्लभ स्वर्ण मुद्रायें भी लाने लगे । उनसे भी अधिक मूल्यवान् और महत्त्वपूर्ण अन्य सामग्री भी इन्होंने एकत्रित की । उन सबका वर्गीकरण और संरक्षण भी बड़ा कठिन कार्य था । थोड़े दिन बाद ही संग्रहालय की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी । भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग और संग्रहालयों के अधिकारी यहां आने लगे । यहां के संग्रहालय को वे विस्फारित नेत्रों से देखते और कहते - हम तो कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि केवल एक व्यक्ति भी इतना बड़ा और महत्वपूर्ण संग्रहालय बना सकता है और वह भी बिना किसी सरकारी या गैर-सरकारी सहायता के ही । वास्तव में यह बड़ा अद्भुत और अनूठा प्रयोग आचार्य जी का है । जिस बहुमूल्य सामग्री को प्राप्त करने के लिये शासन-तंत्र पानी की तरह पैसा बहाता है उसे श्री आचार्य जी बहुधा या तो भेंट में प्राप्त कर लेते हैं या नाममात्र के मूल्य पर । यह सब इनके महान् व्यक्तित्व और सेवा का ही फल है ।
अल्पकाल में इतने बड़े संग्रहालय (म्यूजियम) का निर्माण केवलमात्र श्री पूज्य आचार्य जी के अटूट उत्साह, गम्भीर अध्यवसाय, प्रबल लग्न, दृढ़ संकल्प और विशिष्ठ कार्यक्षमता का ही परिणाम है । अनेक संस्थाओं का कार्यभार तथा अहर्निश जनजागृति एवं जनकल्याण की चिन्ता और इस पर भी अत्यल्प सीमित साधन होते हुये इतने बड़े राष्ट्रीय स्तर के संग्रहालय का निर्माण उनके अपने विशिष्टगुणसम्पन्न कर्मठ व्यक्तित्व की ओर संकेत कर रहा है । जिन सज्जनों ने इस संग्रहालय को अपनी सूक्ष्मेक्षिका से एवं अध्ययनात्मक दृष्टि से देखा है वे जानते हैं यहां कितनी महत्त्वपूर्ण, दुर्लभ और उपादेय ऐतिहासिक सामग्री एकत्रित है । इसको एकत्रित करने के लिए कितना कष्टसाध्य परिश्रम और व्यय करना पड़ा है ? यह कल्पना से परे की बात है । संग्रहालय में काम करते हुये हमने आचार्य जी के साथ अनेक बार यात्रायें की हैं । उन लंबी यात्राओं की अपनी ही कहानी है । सन् १९६७ की बात है । ज्येष्ठ का तपता हुआ मास था । इलाहाबाद से लगभग ६४ किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण पश्चिम में यमुना के तट पर प्राचीन नगर कौशाम्बी के खण्डहरों पर हम घूम रहे थे । यहां एक विशेष उद्देश्य से हम आये थे । हमें सूचना मिली थी कि यहां किसी व्यक्ति को ताम्रपत्र मिले हैं । खोजते हुए हम उसके घर पहुँचे । पता चला कि वह ताम्रपत्रों को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच चुका है । हम उसके यहां पहुंचे । वह उसका महत्त्व व मूल्य बढ़ाने के लिये आसानी से दिखाना नहीं चाहता था । बहुत कठिनाई से उस व्यक्ति ने एक-एक करके वे चारों ताम्रपत्र और राजा की वह मोहर हमें दिखलाई जो उनमें लगी थी । अगले दिन ११ बजे तक हम उसको देने के लिये राजी कर पाये । वह उनके तीस हजार रुपये मांगता था । जबकि सौदा हुआ तीन हजार में । इन ताम्रपत्रों में कम से कम २५ किलो वजन तो है ही । ठीक ग्यारह बजे हम उनको सिर पर उठाकर चले । यहां से लगभग १५ किलोमीटर दूर सराय आकिल पहुंचकर हमें इलाहाबाद के लिये बस पकड़नी थी । इस बार हमारे पास जीप नहीं थी । गांववालों ने कहा कि दोपहर का समय है, तांगा नहीं मिलेगा, आप मत जाइये । परन्तु आचार्य जी ने एक बार जो ठान लिया उसको कैसे मोड़ा जा सकता था । श्री पूज्य आचार्य जी सदा नंगे पैरों रहते हैं । मैं भी नंगे पैर था । उस दिन इतनी तेज धूप और गर्मी थी कि जीवन में शायद ही कभी मैंने देखी होगी ।
सच मानिये मैं उस समय नहीं चलना चाहता था । धूप से घबरा रहा था । इस बात को आचार्य जी भी जान गये । इसलिये अब तो चलना और भी आवश्यक हो गया । वे अपने ब्रह्मचारी को इतना निर्बल देखना कैसे पसन्द कर सकते थे । किन्तु ब्रह्मचारी के सामने "दुबली को दो आषाढ़" वाली कहावत याद आ रही थी । एक तो भयंकर तपती धरती पर नंगे पैर चलना और दूसरे सिर पर ताम्रपत्रों का भार । श्रद्धावश मैं आचार्य जी को वे दे नहीं सकता था किन्तु जब हम कई किलोमीटर चलकर आ चुके तो न जाने वह श्रद्धा कहां काफूर हो गई । मैं मन ही मन चाहने लगा कि किसी तरह आचार्य जी एक बार फिर ताम्रपत्र लेने के लिये कह दें तो मैं झट इस भार को दे दूं । थोड़ी देर में उन्होंने फिर कहा और मैंने थोड़ी राहत महसूस की । मुझे आठ वर्ष गुरुकुल में रहते हुये हो गये थे । दुनियावी दृष्टि से वहां तपस्या भी कर रहे थे किन्तु उस दिन मैंने जाना, वास्तविक तपस्या तो आज हुई है जिसको आचार्य जी रोज ही करते हैं । उस दिन मैंने इनको जितना निकट से देखा शायद पहले कभी नहीं । नंगे सिर, पैर, भूखे पेट, सूखे ओठ निर्जन वन में से १५ किलोमीटर यात्रा करके जिसके चेहरे पर कोई रेखा नहीं आई वह आदमी किस धातु का बना होगा, यह आप अनुमान लग सकते हैं । दूसरी ओर मैं था जो इस यात्रा को महादुःख मान रहा था किन्तु आचार्यप्रवर के लिये यह सामान्य बात थी । एक के मन में यात्राजन्य विषाद था तो दूसरे के मन में लक्ष्यप्राप्ति का उत्साह । कितना बड़ा अन्तर है दोनों के बीच । शायद यही अन्तर इनको महान् बनाता है । इस तरह की न जाने आचार्य-प्रवर ने कितनी यात्रायें की हैं, तब इस संग्रहालय का निर्माण हुआ है । इस कार्य पर वे छः जीप जीर्ण कर चुके हैं । इससे सहज में जाना जा सकता है उन्होंने इस कार्य के लिये कितना परिश्रम किया है ।
एक बार कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास, पुरातत्त्व व संस्कृति विभाग के रीडर डा० सूरजभान हमारे साथ हरयाणा की ऐतिहासिक यात्रा पर थे । वे भी गर्मी के ही दिन थे । उस समय अनेक पुरातत्त्वीय महत्त्व के प्राचीन खंडहरों का सर्वेक्षण हमने किया । यात्रा के उपरान्त उन्होंने कहा - आचार्य जी महाराज जितना कर्मठ और धुन का धनी आदमी मैंने आज तक न तो देखा है और शायद न ही अपने जीवन में देख ही पाऊंगा ।
सन् १९६३ में आचार्य जी ने कन्या गुरुकुल नरेला में भी पुरातत्त्व संग्रहालय की स्थापना की । यह संग्रहालय भी झज्जर गुरुकुल संग्रहालय की भांति अति समृद्ध और महत्त्वपूर्ण संग्रहालय है । यहां भी संग्रहालय को यहां की स्नातिकायें या ब्रह्मचारिणियां ही संभालती हैं । झज्जर संग्रहालय का सम्पूर्ण कार्यभार ब्र० विरजानन्द दैवकरणि पर है । वे पिछले अठारह वर्ष से इस कार्य में जुटे हैं । उनका गहन अध्ययन है । ब्राह्मी, खरोष्ठी और इण्डोग्रीक आदि प्राचीन लिपियों के वे विद्वान् हैं । अरबी फारसी का भी अध्ययन उन्होंने किया है । श्री आचार्य जी सामग्री लाकर उन्हें सौंप निश्चिन्त हो जाते हैं । वे जिस आत्मीयता से उनका रख-रखाव व अध्ययन करते हैं वह वास्तव में प्रशंसनीय है । पूज्य आचार्य जी को अपने कार्य व तपस्या के अनुरूप ही वे मिले हैं । इसी कारण आचार्य जी (स्वामी जी) प्रचार आदि के कार्य के लिये समय निकाल लेते हैं । कई वर्ष तक स्वयं मैंने भी संग्रहालय को संभाला है किन्तु श्री विरजानन्द मुझ से कहीं अधिक तन्मयता, लगन, श्रद्धा और परिश्रम से कार्य करते हैं । इस युग में ऐसे कर्मठ आचार्य और उसके अनुरूप शिष्य का मिलना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है ।
श्री आचार्य जी द्वारा स्थापित ये दोनों संग्रहालय आज देश के प्रमुख संग्रहालयों में से हैं । यहां बहुत सारी ऐसी पुरातत्त्वीय सामग्री है जो दूसरे किसी म्यूजियम में नहीं है । प्राचीन सिक्कों का संग्रह इन दोनों में ही बेजोड़ है । सिक्कों की दृष्टि से देशभर का कोई भी संग्रहालय इनकी बराबरी नहीं कर सकता । प्राचीन गणतंत्रों के सिक्के, प्राचीन मुद्रा सांचे, शुंग, कुषाण और गुप्तकालीन मृण्मूर्तियां और हजारों मोहरें यहां की अपनी विशेषता है । प्रस्तर-मूर्तियां व पांडुलिपियां ताम्रपत्र और शिलालेख भी यहां पर्याप्त मात्रा में हैं । ये संग्रहालय विशुद्ध पुरातत्त्वीय संग्रहालय हैं । ताम्रयुगीन शस्त्राशस्त्रों का भी यहां अनूठा संग्रह है ।
संग्रहालय के निर्माण में अनेक लोगों का योगदान रहा है । मास्टर भरतसिंह बामला, स्वामी नित्यानन्द, वानप्रस्थी रामपत, गंगाविष्णु शर्मा सिहोल आदि अनेक लोगों मे संग्रहालय को सामग्री दी है । संग्रहालय प्रारम्भ करने का भी एक रोचक इतिहास है । श्री अचार्य जी की इतिहास में प्रारम्भ से ही रुचि थी । ये यत्र-तत्र अपने भाषणों में भी इतिहास व पुरातत्त्व संबन्धी चर्चा करते रहते थे । इनके सभी श्रद्धालु इनकी इस रुचि से परिचित थे । एक दिन ये गढ़ी (बोहर) गांव में थे कि श्री महाशय सूबेसिंह आर्य ने एक काली मिट्टी का गोल सा ठप्पा लाकर दिया और कहा कि एक बूढ़ा आदमी इसको हुक्के की चिलम में ठीकरी का प्रयोग करता है । उस समय यह किसी को नहीं पता था कि यह किसी प्राचीन टकसाल का सांचा है । यह बहुत ही गोल व व्यवस्थित बना था । कुछ चिह्न भी उस पर अंकित थे । श्री आचार्य जी ने वह मिट्टी की वस्तु परीक्षण के लिए श्री पं० जयचन्द्र विद्यालंकार के पास भेज दी किन्तु वे भी इसको नहीं जान पाये । कई वर्ष तक श्री आचार्य जी भी उसको नहीं पढ़ पाये । वास्तव में उस पर आदि देवनागरी लिपि में 'राह' ये दो अक्षर अंकित थे । बाद में जब कुछ और उसी प्रकार के मुद्रा-सांचे मिले तो पता चला कि यह गुर्जर प्रतिहार राजा आदि बराह मिहिर भोज के मुद्रा-सांचे हैं जिनमे किसी पर 'आदि' और किसी पर 'राह' शब्द अंकित है । उसके बाद मैं तथा ब्र० दयानन्द वहां गये । तीन दिन हम उस खण्डहर पर खुदाई करते रहे । वहां हमें पूरी टकसाल मिली । वहां गुर्जर प्रतिहार सामन्तदेव और गधैय्या वंशों की तीन टकसालें थीं । इन टकसालों से लगभग छः हजार सांचे हमने निकाले । टकसाल के दूसरे उपकरण भी मिले । वहां लोगों से बात करने पर पता चला कि यहां ये सांचे-ठप्पे गोफियों में डालकर चिड़िया उड़ाने के लिये फेंके जाते रहे हैं और इस प्रकार यह अमूल्य निधि वर्षों से नष्ट हो रही थी । श्री आचार्य जी की प्रेरणा पर हमने जाकर इसे बचाया ।
दो प्राचीन खंडहरों पर श्री आचार्य जी ने उत्खनन (excavation) भी कराया । अगस्त १९६४ में औरंगाबाद के टीले पर तथा सन् १९६९ में मित्ताथल (भिवानी) में यह खुदाई हुई । गुरुकुल झज्जर के ब्रह्मचारियों ने इन दोनों उत्खननों में भाग लिया । इनसे भी संग्रहालय को सामग्री मिली । नौरंगाबाद से तो बहुत ही महत्त्वपूर्ण सामग्री समय-समय पर मिलती रही है । यहां आहत मुद्राओं, 'यौधेयानां बहुधान्यके' प्रकार की मुद्राओं, इण्डोग्रीक तथा कुषाण मुद्राओं की टकसालें मिली हैं । इन से प्राचीन भारत में मुद्रा-निर्माण पद्धति पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है । मुख्य रूप से इन्हीं के आधार पर श्री स्वामी ओमानन्द सरस्वती (आचार्य भगवानदेव) जी ने "भारत के प्राचीन लक्षण स्थान" नामक ग्रन्थ की रचना की है । संग्रहालय की दुर्लभ और महत्त्वपूर्ण सामग्री के आधार पर इनका दूसरा ग्रन्थ "भारत के प्राचीन मुद्रांक" (Seals and Sealings of Ancient India) भी प्रकाशित हो चुका है । ये दोनों ही ग्रन्थ भारतीय इतिहास और पुरातत्त्व की अमूल्य निधि हैं । मुद्रा-निर्माण पद्धति पर तो इतना विस्तृत ग्रन्थ पहली बार सामने आया है । दर्जनों प्राचीन नई टकसालों को प्रकाश में लाकर इन्होंने इतिहास जगत् को अमूल्य देन दी है जिसका मूल्यांकन भविष्य में अधिक हो सकेगा । इन ग्रन्थों के लिखने में श्री ब्र० विरजानन्द जी ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है । स्वामी जी महाराज अब अपना अगला ग्रन्थ "ताम्रयुगीन शस्त्राशस्त्र" लिखने में संलग्न हैं । श्री आचार्य जी ने संग्रहालय में जो सामग्री एकत्रित की है वह राष्ट्र की अमूल्य निधि है । इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुये समय-समय पर भारत सरकार और हरयाणा सरकार संग्रहालय को आर्थिक अनुदान देती रही है । यद्यपि कार्य और संग्रह के प्रदर्शन और रख-रखाव की दृष्टि से वह अनुदान नगण्य सा ही है तथापि शासन द्वारा उसकी स्वीकृति मात्र ही कार्य की महत्ता के लिये कम नहीं । वैसे यह हमारे देश की विडंबना ही है कि व्यर्थ के कामों में शासन का धन पानी की तरह बहता है और अच्छे कार्यों के लिये अपेक्षित सहायता और प्रोत्साहन नहीं मिलता । इसी कारण यहां राष्ट्रीय हित के कार्यों में रुचि लेने की प्रवृत्ति साधारण लोगों में दृष्टिगत नहीं होती । वास्तव में आचार्य जी द्वारा संग्रहालयों का निर्माण राष्ट्र को उनकी एक बहुत बड़ी देन है ।
संग्रहालय की स्थापना के साथ ही आचार्य जी महाराज ऐतिहासिक शोध की ओर अधिक प्रवृत्त हुये । इन्होंने कई ऐसी खोजें की हैं जो अभूतपूर्व तो हैं ही, साथ ही भारतीय इतिहास की बहुत बड़ी उपलब्धि भी हैं । इसी कारण इनको कई बार विदेशों से निमन्त्रण आये और इन्होंने वहां अपने शोध लेख प्रस्तुत किये । इसका उल्लेख हम इनकी विदेश यात्रा प्रसंग में करेंगे । एक यात्रा में मैं भी इनके साथ था । योरोपीय देशों में भी इनके व्यक्तित्व की छाप पड़े बिना नहीं रहती थी, यह मैंने देखा ।
पुस्तक :- स्वामी ओमानंद सरस्वती जीवन चरित्
लेखक :- श्री वेदव्रत शास्त्री (आचार्य प्रिंटिंग प्रेस रोहतक)
















































